माता सीता और श्रीराम के रिश्ते की पांच खास बातें, अपनाकर आप भी बन सकते हैं आदर्श पति-पत्नी

राम नवमी 6 अप्रैल 2025 को मनाई जा रही है। इस दिन प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था। श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं, जिन्हें एक आदर्श बेटा, भाई, पति, मित्र और राजा के तौर पर जाना जाता है। मर्यादापुरुषोत्तम राम ने अपनी पत्नी सीता के लिए लंका नरेश रावण से युद्ध किया। ये युद्ध तब हुआ जब श्रीराम न तो किसी देश के राजा थे और न राजकुमार। वह तो सिर्फ एक वनवासी थे, जो 14 वर्ष के वनवास पर अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ निकले थे। माता सीता भी पत्नीव्रता नारी थीं। एक सुकोमल राजकुमारी, जिन्होंने महलों का जीवन त्याग पति संग वन जाने का निश्चय किया। हर कठिनाई में पति का साथ दिया।

माता सीता और श्रीराम का रिश्ता आज भी आदर्श माना जाता है। आज भी बड़े-बुजुर्ग दंपति को राम-सीता की जोड़ी होने का आशीर्वाद देते हैं। लेकिन महज आशीर्वाद से आप न तो प्रभु राम से पति और ना माता सीता सी पत्नी बन सकते हैं। श्री सीता-राम के रिश्ते से कुछ अच्छी बातों को अपनाकर आप अपने रिश्ते को आदर्श बना सकते हैं। यहां माता सीता और श्रीराम के रिश्ते के कुछ गुण बताए जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आज के युग में भी एक आदर्श पति-पत्नी बना जा सकता है।

सुख-दुख के साथी

भगवान श्रीराम और माता सीता एक दूसरे के साथ हर परिस्थिति में खड़े रहे। जब राम जी वनवास गए तो माता सीता भी उनके साथ गईं। वहीं जब माता सीता का हरण लंका नरेश रावण ने किया तो श्रीराम ने उनसे युद्ध कर अपनी पत्नी की रक्षा की। अच्छे और बुरे दोनों समय में पति-पत्नी को एक दूसरे का साथ देना चाहिए। हर पति-पत्नी को माता सीता और राम जी के रिश्ते से ये सीख लेनी चाहिए।

पद का लोभ नहीं

माता सीता के स्वयंवर में सुदूर देशों के महाराज, शूरवीर और बड़े-बड़े महारथी शामिल हुए थे लेकिन माता सीता ने एक राजकुमार को अपना वर चुना। उन्होंने श्रीराम जी का पद या राजपाठ नहीं देखा, बल्कि मन से उन्हें अपना पति मान लिया। वहीं जब श्रीराम ने राज्याभिषेक से पहले राजपाट छोड़कर वनवास जाने का फैसला लिया तो भी माता सीता ने पद और ऐशो आराम की परवाह नहीं की। वह उनके साथ वन के लिए चल पड़ीं। राम जी ने भी जब अपनी प्रजा के लिए माता सीता की परित्याग किया तो राजा होते हुए भी जमीन पर लेटने, महल का सुख छोड़कर माता सीता सा संन्यासी जीवन अपनाया। उन्होंने भी पद का लोभ न रखा और ना ही राजा होते हुए दूसरे विवाह का विचार किया।

वैवाहिक धर्म और भरोसा

श्री राम और सीता एक-दूसरे का बेहद सम्मान करते थे। उनके रिश्ते की नींव विश्वास पर टिकी थी। जब वनवान के दौरान सूपनखा ने अपने सौंदर्य रूप में श्रीराम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो राम जी ने पत्नीव्रता पति होने का धर्म निभाया। आजीवन एक ही विवाह करने और माता सीता को ही प्राण प्रिय मानते हुए सूपनखा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। माता सीता ने भी रावण द्वारा हरण के बाद अपने पतिव्रता धर्म पर आंच नहीं आने दी और पवित्रता को बनाए रखा। यहां भी राम जी ने पत्नी सीता से दूर होते हुए भी अपना पति धर्म निभाया। जब अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हुआ तो पत्नी की जरूरत होने पर माता सीता की सोने की प्रतिमा बनवाकर अपने साथ बैठाया। दोनों ने अपने वैवाहिक धर्म का पालन करते हुए रिश्ते में भरोसे को बनाए रखा।

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